डर और घबराहट पर गीता क्या कहती है — 4 श्लोक
जब मन में डर हो, भगवद्गीता हमें निडर होना सिखाती है। डर मिटाने वाले 4 श्लोक, उनके अर्थ के साथ — सरल हिंदी में।
डर स्वाभाविक है, पर गीता सिखाती है कि आत्मा अमर है और कर्तव्य से बड़ा कोई भय नहीं। ये श्लोक मन को साहस देते हैं।
1. आत्मा अमर है
न जायते म्रियते वा कदाचिन्…
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा न जन्म लेती है न मरती है। जब यह बात समझ आती है, तो सबसे बड़ा भय — मृत्यु का भय — कम हो जाता है।
2. कर्तव्य से मत डरो
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
गीता · 2.31अपने कर्तव्य को देखकर तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए। सही राह पर बढ़ने का निश्चय ही डर को हराता है।
3. मुझ पर भरोसा रखो
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
"मा शुचः" यानी "चिंता मत करो"। जब सब कुछ अनिश्चित लगे, तो श्रद्धा के साथ ईश्वर पर भरोसा मन को स्थिर करता है।
4. मन को साधो
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
गीता · 6.6जिसने अपने मन को जीत लिया, उसके लिए मन ही सबसे बड़ा मित्र है। मन साधने पर बाहर का डर अपने आप कमज़ोर पड़ जाता है।
अभ्यास
डर के क्षण में एक लंबी साँस लें और मन में दोहराएँ — "मेरा काम सही है, परिणाम ईश्वर पर।" फिर अगला छोटा कदम उठाएँ।
अपनी आज की मनःस्थिति लिखकर उससे जुड़ा श्लोक पाइए —
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