श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते — पूरा अर्थ और जीवन में उपयोग

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का सरल अर्थ, भावार्थ और आज के जीवन में इसे कैसे अपनाएँ — सब कुछ आसान हिंदी में।

संस्कृत कला22 जून 20261 मिनट
श्लोककर्मण्येवाधिकारस्तेमा फलेषु कदाचन❀ संस्कृत कला
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भगवद्गीता का यह श्लोक शायद सबसे ज़्यादा सुना-पढ़ा गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का सबसे गहरा रहस्य इसी एक पंक्ति में बता देते हैं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

श्रीमद्भगवद्गीता · 2.47

सरल अर्थ

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। इसलिए न तो कर्म के फल का कारण बनो, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।

भावार्थ — श्रीकृष्ण क्या समझा रहे हैं

हम अक्सर परिणाम की चिंता में इतने डूब जाते हैं कि काम ही ठीक से नहीं कर पाते। गीता कहती है — अपना सर्वश्रेष्ठ दो, और फल को समय पर छोड़ दो।

  • कर्म पर ध्यान दो, परिणाम पर नहीं।
  • फल की चिंता तनाव लाती है; कर्तव्य शांति लाता है।
  • आलस्य भी आसक्ति है — काम से भागना समाधान नहीं।

आज से एक अभ्यास

कोई भी काम शुरू करने से पहले एक पल रुकें और कहें — "मेरा काम पूरी मेहनत से करना है, बाक़ी समय पर।" यही इस श्लोक का जीवंत रूप है।

जीवन में कैसे उतारें

परीक्षा, नौकरी, रिश्ते — हर जगह यही सूत्र काम आता है। मेहनत आपके हाथ में है, नतीजा कई बातों पर निर्भर करता है। जब आप फल की पकड़ ढीली करते हैं, तभी मन सबसे स्थिर और शक्तिशाली होता है।

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