श्लोक

शिव तांडव स्तोत्र: अर्थ सहित (रावण रचित स्तुति)

शिव तांडव स्तोत्र के आरंभिक 4 श्लोक, मूल संस्कृत व सरल हिंदी अर्थ सहित। जानिए रावण ने इसे क्यों रचा, इसकी डमरू-जैसी लय का रहस्य और पाठ की सही विधि।

संस्कृत कला28 जुलाई 20264 मिनट
श्लोकडमड्डमड्डमड्डमन्चण्डताण्डवं❀ संस्कृत कला
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शिव तांडव स्तोत्र (ताण्डव स्तोत्रम्) भगवान शिव की सबसे ओजस्वी स्तुति है। इसे पढ़ते ही ऐसा लगता है जैसे डमरू बज उठा हो — शब्द स्वयं नृत्य करने लगते हैं। और सबसे अद्भुत बात यह है कि इसे रचा था स्वयं लंकापति रावण ने।

सावन का महीना शिव को सबसे प्रिय है — इस स्तोत्र के पाठ के लिए इससे उत्तम समय कोई नहीं।

रावण ने इसे क्यों रचा?

रावण अपनी विद्वत्ता और शिव-भक्ति के लिए जाना जाता था। परंपरा कहती है कि उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तुति रची — शिव के उस रूप का वर्णन करते हुए जब वे ताण्डव (प्रचंड ब्रह्मांडीय नृत्य) कर रहे हैं।

एक गहरी बात

जिस रावण को हम अहंकार का प्रतीक मानते हैं, उसी ने शिव की सबसे सुंदर स्तुतियों में से एक रची। यह स्तोत्र याद दिलाता है कि भक्ति किसी की बपौती नहीं — और यही इसका सबसे मार्मिक पक्ष है।

इसकी लय का रहस्य

यह स्तोत्र पञ्चचामर छंद में है — हर पंक्ति में 16 अक्षर, लघु और गुरु के नियमित क्रम में। यही क्रम पढ़ते समय एक तेज़, लुढ़कती हुई लय पैदा करता है, ठीक डमरू की थाप जैसी।

और कवि ने इसे और आगे बढ़ाया — शब्दों में ही ध्वनि भर दी:

  • डमड्डमड्डमड्डमन् — डमरू की थाप
  • धगद्धगद्धगज् — तीसरे नेत्र की अग्नि की लपट

संस्कृत काव्य में यह अलंकार-कौशल का शिखर माना जाता है।

श्लोक व अर्थ

श्लोक 1

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥

शिव ताण्डव स्तोत्रम् · 1

अर्थ: जिनकी जटाओं के वन से बहती गंगा की धारा भूमि को पवित्र कर रही है, जिनके गले में ऊँचे सर्पों की माला लटक रही है, और जिनका डमरू "डमड् डमड् डमड्" की ध्वनि से निरंतर बज रहा है — ऐसे प्रचंड ताण्डव करते शिव हमारा कल्याण करें।

श्लोक 2

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्जलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

शिव ताण्डव स्तोत्रम् · 2

अर्थ: जिनकी कड़ाही-सी जटाओं में गंगा वेग से घूम रही है, जिनके मस्तक पर लहराती लताओं जैसी लटें शोभा दे रही हैं, जिनके ललाट की अग्नि "धगद् धगद्" जल रही है, और जिनके सिर पर बाल-चंद्रमा सुशोभित है — उन शिव में मेरा प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता रहे।

श्लोक 3

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

शिव ताण्डव स्तोत्रम् · 3

अर्थ: जो पर्वतराज की पुत्री (पार्वती) के साथ लीला में रत हैं, जिनके नृत्य से दिशाओं के छोर तक आनंद फैल रहा है, जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा बड़ी-बड़ी विपत्तियों को रोक देती है — उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनंद पाए।

श्लोक 4

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥

शिव ताण्डव स्तोत्रम् · 4

अर्थ: जिनकी जटाओं में लिपटे भूरे सर्पों के फणों की मणियाँ चमक रही हैं और उनका प्रकाश दिशाओं के मुख पर कुंकुम-सा लेप कर रहा है, जो मतवाले हाथी की खाल का उत्तरीय धारण करते हैं — उन भूतभर्ता (सबके पालक) शिव में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।

पूरा स्तोत्र

ऊपर आरंभिक चार श्लोक अर्थ सहित दिए गए हैं — यही सबसे अधिक पढ़े जाते हैं। सम्पूर्ण स्तोत्र में 17 श्लोक हैं। पूरा शुद्ध पाठ किसी प्रामाणिक स्रोत (जैसे संस्कृत विकिस्रोत) या प्रकाशित स्तोत्र-संग्रह से ही लें — इंटरनेट पर अनेक अशुद्ध पाठ प्रचलित हैं।

पाठ की विधि

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ आसन पर बैठें; शिवलिंग या शिव की छवि सामने रखें।
  2. दीप जलाकर जल व बेलपत्र अर्पित करें।
  3. धीरे-धीरे, लय के साथ पाठ करें — शब्दों की गति ही इसकी शक्ति है।
  4. सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि और विशेषकर सावन में पाठ श्रेष्ठ माना जाता है।

शुरुआत कैसे करें

यह स्तोत्र कठिन है — एक ही दिन में पूरा साधने की कोशिश न करें। पहले श्लोक 1 को कई दिन दोहराएँ, जब लय सध जाए तो आगे बढ़ें। जब तक उच्चारण न आए, सरल "ॐ नमः शिवाय" जपें। श्रद्धा गति से बड़ी है।

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लय, भक्ति और शब्द-शक्ति का ऐसा संगम संस्कृत साहित्य में दुर्लभ है। इस सावन एक श्लोक से शुरुआत कीजिए। हर हर महादेव। 🔱

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा था?

परंपरा के अनुसार इसकी रचना लंकापति रावण ने की थी। रावण शिव का परम भक्त था, और मान्यता है कि उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह स्तुति रची।

शिव तांडव स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इसमें कुल 17 श्लोक (चतुष्पदी) हैं। कुछ संस्करणों में 16 श्लोक मिलते हैं, क्योंकि अंतिम श्लोक फल-श्रुति (पाठ का फल बताने वाला) माना जाता है।

शिव तांडव स्तोत्र की लय इतनी अलग क्यों लगती है?

यह पञ्चचामर छंद में रचा गया है — प्रत्येक पंक्ति में 16 अक्षर, लघु-गुरु के क्रम में। इसी कारण पढ़ते समय डमरू जैसी लय बनती है, और 'डमड्डमड्डमड्डमन्' जैसे शब्द उस ध्वनि की नकल करते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि और विशेषकर सावन (श्रावण) मास में इसका पाठ शुभ माना जाता है। प्रातः स्नान के बाद शिवलिंग के समक्ष पाठ करना श्रेष्ठ है।

शिव तांडव स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ माना जाता है?

मान्यता है कि इसके पाठ से मन निर्भय होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और शिव की कृपा प्राप्त होती है। इसकी लय मन को एकाग्र करती है — यही इसका सबसे प्रत्यक्ष लाभ है।

क्या शुद्ध उच्चारण न आने पर भी पाठ कर सकते हैं?

हाँ। यह स्तोत्र कठिन है, इसलिए धीरे-धीरे अभ्यास करें — एक-एक श्लोक। जब तक उच्चारण न सधे, 'ॐ नमः शिवाय' जपें। श्रद्धा सबसे बड़ी है, गति नहीं।

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