दुख और शोक में गीता के 5 श्लोक — अर्थ सहित
किसी अपने को खोने का दुख हो तो गीता क्या कहती है? शोक में सहारा देने वाले 5 श्लोक — अशोच्यान् से अव्यक्तादीनि तक, सरल अर्थ और कठिन समय में उनका उपयोग सहित।
जब कोई अपना चला जाता है, तो शब्द छोटे पड़ जाते हैं। गीता उस क्षण में यह नहीं कहती कि "दुख मत करो" — वह इतना कहती है कि जो गया, वह मिटा नहीं।
गीता का आरंभ ही शोक से होता है। अर्जुन युद्धभूमि में अपने ही परिजनों को देखकर टूट जाते हैं, धनुष हाथ से गिर जाता है। पूरा दूसरा अध्याय उसी शोक का उत्तर है — इसीलिए शोक-काल में यही अध्याय सबसे अधिक पढ़ा जाता है।
पहले एक बात
शोक करना कमज़ोरी नहीं है। अर्जुन जैसे योद्धा भी रोए थे — और श्रीकृष्ण ने उन्हें डाँटा नहीं, समझाया। ये श्लोक दुख को मिटाने के लिए नहीं, साथ देने के लिए हैं।
1. जो जाना है, उसका शोक कैसा
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
अर्थ: तुम उनका शोक कर रहे हो जिनका शोक नहीं करना चाहिए, और बातें ज्ञान की कर रहे हो। जो सच जानते हैं, वे न जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए।
यह गीता का पहला उपदेश है। कठोर लगता है — पर इसका भाव यह है कि जिसे हम खोया समझ रहे हैं, वह वास्तव में समाप्त नहीं हुआ।
2. शरीर बदलता है, हम नहीं
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
अर्थ: जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही आत्मा दूसरा शरीर प्राप्त करती है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होते।
यह गीता की सबसे कोमल उपमा है। बचपन के जाने पर हम शोक नहीं करते — क्योंकि हम जानते हैं कि बालक गया नहीं, बड़ा हो गया। मृत्यु को भी गीता उसी क्रम की एक कड़ी कहती है।
3. जो अवश्यंभावी है
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
अर्थ: जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए जो टाला नहीं जा सकता, उसके लिए शोक करना उचित नहीं।
4. सुख-दुख आते-जाते रहते हैं
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! इंद्रियों के विषयों से सर्दी-गर्मी और सुख-दुख उत्पन्न होते हैं। ये आते-जाते रहते हैं, अनित्य हैं — इन्हें सहन करो।
यहाँ तितिक्षस्व शब्द महत्वपूर्ण है — सहो, न कि भूल जाओ। गीता दुख को नकारने को नहीं कहती, उसे धैर्य से पार करने को कहती है।
5. आना और जाना — दोनों अदृश्य से
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
अर्थ: सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त (अदृश्य) थे, बीच में व्यक्त हुए, और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं। फिर इसमें शोक कैसा?
जन्म से पहले की स्थिति पर हम दुखी नहीं होते। गीता कहती है — मृत्यु उसी अव्यक्त में लौटना है, कोई नया अंत नहीं।
शोक-काल में एक सरल अभ्यास
प्रतिदिन गीता के दूसरे अध्याय के कुछ श्लोक पढ़ें — पूरा अध्याय एक साथ नहीं, कुछ श्लोक। पढ़ने के बाद कुछ क्षण मौन बैठें। बहुत परिवार तेरहवीं तक यही करते हैं, और यह मन को धीरे-धीरे स्थिर करता है।
यदि दुख भारी पड़ रहा हो
शोक की कोई निश्चित अवधि नहीं होती, और हर व्यक्ति का समय अलग होता है। पर यदि दुख इतना बढ़ जाए कि नींद, भोजन या दैनिक जीवन लंबे समय तक प्रभावित हो, तो किसी परिजन से बात कीजिए और चिकित्सक या मनोविशेषज्ञ की सहायता अवश्य लें। सहायता माँगना श्रद्धा के विरुद्ध नहीं है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुख और शोक के बारे में गीता क्या कहती है?
गीता शोक को गलत नहीं कहती — वह उसका कारण समझाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और आत्मा नष्ट नहीं होती। दुख इसलिए होता है कि हम शरीर को ही सब कुछ मान लेते हैं। यह समझ शोक को मिटाती नहीं, पर उसे सहने योग्य बना देती है।
किसी अपने के जाने पर कौन सा श्लोक पढ़ें?
गीता 2.13 (देहिनोऽस्मिन्यथा देहे) और 2.27 (जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः) सबसे अधिक सांत्वना देने वाले माने जाते हैं। कई परिवार शोक-काल में गीता का दूसरा अध्याय पूरा पढ़ते हैं।
गीता का दूसरा अध्याय शोक में क्यों पढ़ा जाता है?
क्योंकि पूरा दूसरा अध्याय अर्जुन के शोक से ही आरंभ होता है। अर्जुन अपने ही परिजनों को सामने देखकर टूट जाते हैं, और श्रीकृष्ण का पहला उपदेश उसी शोक का उत्तर है। इसीलिए इसे सांख्य योग कहा जाता है।
क्या श्लोक पढ़ने से दुख सच में कम होता है?
श्लोक दुख को मिटाते नहीं — वे उसे अर्थ देते हैं। अर्थ समझकर पढ़ने से मन को एक सहारा और दृष्टि मिलती है। पर शोक एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे समय लगता है; यदि दुख लंबे समय तक असहनीय बना रहे तो किसी परिजन, चिकित्सक या मनोविशेषज्ञ से बात अवश्य करें।
अर्जुन का शोक कैसे दूर हुआ?
एक क्षण में नहीं। श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा की नित्यता, कर्तव्य और समत्व — तीनों समझाए, और यह संवाद अठारह अध्यायों तक चला। यही गीता का सन्देश है कि शोक से बाहर आना एक यात्रा है, एक आदेश नहीं।
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